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UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगाकर केंद्र सरकार और आयोग—दोनों को बड़ा संदेश दिया

 देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़े यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगाकर केंद्र सरकार और आयोग—दोनों को बड़ा संदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब तक नियमों के प्रावधान पूरी तरह स्पष्ट और संतुलित नहीं किए जाते, तब तक इन्हें लागू नहीं किया जा सकता।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या की पीठ ने गुरुवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि नए नियमों की भाषा और दायरा कई सवाल खड़े करता है। अदालत ने माना कि नियमों का उद्देश्य भले ही उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और भेदभाव की रोकथाम बताया गया हो, लेकिन इसकी व्याख्या और क्रियान्वयन में असंतुलन की आशंका नजर आती है।

यह टिप्पणी उन याचिकाओं पर की गई है, जिनमें आरोप लगाया गया है कि 13 जनवरी को अधिसूचित किए गए नए यूजीसी नियम सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार को जन्म दे सकते हैं। अदालत ने केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है और नियमों के ड्राफ्ट पर दोबारा विचार कर उसे संशोधित करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को तय की गई है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कॉलेज परिसरों की जमीनी हकीकत पर भी सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि अगर किसी छात्र के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी होती है, लेकिन आरोपी की पहचान स्पष्ट नहीं है, तो क्या नए नियम ऐसे मामलों का समाधान कर पाएंगे? कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या इन प्रावधानों के तहत रैगिंग जैसे गंभीर मुद्दों का प्रभावी समाधान संभव है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि नए नियमों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा इतनी संकीर्ण है कि इससे एक वर्ग को पहले से ही आरोपी और दूसरे को पीड़ित मान लिया जाता है। इससे विश्वविद्यालयों में भय और अविश्वास का माहौल बनने की आशंका है। वहीं कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि समाज और समुदाय स्थिर नहीं होते—समय के साथ उनमें आर्थिक और सामाजिक बदलाव आते हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यूजीसी के नए नियमों को लेकर देशभर के विश्वविद्यालयों, शिक्षकों और छात्रों में पहले से ही तीखी बहस चल रही है। एक ओर इसे ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को सुरक्षा देने वाला कदम बताया जा रहा है, तो दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि इससे संस्थानों की स्वायत्तता, मेरिट और निष्पक्ष निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

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