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जिस घर से निगम ने 19 साल पहले टैक्स लिया, उसी को अवैध बताता रहा… आखिर आम आदमी जीत गया

पाली में एक आम नागरिक की 30 साल पुरानी लड़ाई आखिर अदालत में जीत में बदल गई। जिस मकान से नगर परिषद वर्ष 2006 में खुद गृहकर वसूल चुकी थी, उसी मकान को बाद में अवैध कब्जा बताकर बेदखल करने की कोशिश की गई। अब अदालत ने साफ कहा है कि परिषद अपने ही रिकॉर्ड से विरोधाभास में खड़ी है और आदेश के बावजूद पट्टा जारी नहीं करने पर निगम आयुक्त के वाहन, चैंबर और सामान तक कुर्क करने के आदेश जारी कर दिए गए हैं।
परिवादी पक्ष के अधिवक्ता अशोक अरोड़ा ने बताया कि अदालत ने अपने फैसले में माना कि विवादित भूखंड पर कब्जा हालिया नहीं बल्कि करीब 30 साल पुराना है। रिकॉर्ड में पहले लूंबाराम, फिर गणपतलाल और बाद में विनोद तेजी का लगातार कब्जा पाया गया। अदालत ने बिजली बिल, पानी कनेक्शन, आधार कार्ड, मतदाता सूची, भामाशाह कार्ड सहित कई दस्तावेजों को महत्वपूर्ण साक्ष्य माना।
परिषद ने टैक्स भी लिया, कब्जा भी बताया अवैध

मामले का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह रहा कि नगर परिषद ने 28 जुलाई 2006 को मकान का 755 रुपए गृहकर वसूल किया था। अदालत ने इसे लोक दस्तावेज मानते हुए कहा कि परिषद एक तरफ टैक्स ले रही थी और दूसरी ओर उसी कब्जे को अवैध बता रही थी।
सरकारी रिकॉर्ड में भी दर्ज मिला नाम
वर्ष 2012 की “प्रशासन शहरों के संग” सर्वे सूची में भूखंड संख्या 615 पर विनोद तेजी का नाम दर्ज मिला। अदालत ने माना कि परिषद के अपने रिकॉर्ड ही वादी के कब्जे को स्वीकार कर रहे हैं।

पूरा विवाद खसरा 631 और 632 पर अटका
नगर परिषद का दावा था कि मकान उसकी व्यावसायिक योजना की सरकारी भूमि खसरा नंबर 632 में स्थित है, लेकिन पटवारी की मौका रिपोर्ट में मकान का अधिकांश हिस्सा खसरा नंबर 631 में पाया गया। अदालत ने माना कि परिषद इस विवाद को स्पष्ट रूप से साबित नहीं कर सकी।

बेदखली का दावा भी नहीं टिक पाया
परिषद ने अदालत में दावा किया कि 7 अप्रैल 2017 को वादी को बेदखल कर दिया गया था। लेकिन अदालत ने पूछा कि बेदखली का पंचनामा कहां है, मौके के फोटो क्यों नहीं हैं और कब्जा हटाने का रिकॉर्ड क्या है। परिषद इन सवालों के ठोस जवाब नहीं दे सकी। अदालत ने माना कि वैध बेदखली साबित नहीं हुई।

परिषद के गवाह की गवाही भी बनी कमजोर कड़ी
परिषद के गवाह बादल सिंह ने जिरह के दौरान स्वीकार किया कि मौके पर आज भी वादी का पक्का मकान बना हुआ है। वह खसरे की स्थिति को लेकर भी स्पष्ट जवाब नहीं दे पाया। अदालत ने इसे महत्वपूर्ण तथ्य माना।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला

जिला अदालत ने Nair Service Society Case सहित सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब स्पष्ट मालिकाना हक साबित न हो, तब लंबे और शांतिपूर्ण कब्जे को संरक्षण मिल सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि वास्तविक मालिक वर्षों तक कब्जा वापस लेने के लिए प्रभावी कार्रवाई नहीं करता, तो कब्जाधारी का दावा मजबूत हो जाता है।

अदालत का सवाल — अगर अवैध था तो इतने साल चुप क्यों रहे?
फैसले में अदालत ने पूछा कि यदि जमीन पूरी तरह सरकारी थी तो नगर परिषद ने 30 साल तक निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं की। टैक्स क्यों लिया गया और रिकॉर्ड में नाम क्यों दर्ज किया गया।

अंतिम आदेश — पट्टा दो, हस्तक्षेप मत करो
6 सितंबर 2025 को दिए गए आदेश में अदालत ने नगर परिषद को एक माह में पट्टा जारी करने के निर्देश दिए थे। साथ ही कहा था कि पट्टा प्रक्रिया पूरी होने तक वादी को बेदखल नहीं किया जाए और कब्जे में किसी प्रकार का हस्तक्षेप न किया जाए।लेकिन सात महीने तक आदेश की पालना नहीं होने पर वादी ने इजराय पेश की। अब अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए निगम आयुक्त के वाहन, चैंबर और सामान कुर्क करने के आदेश जारी किए हैं।

क्या होती है इजराय?
यदि कोई व्यक्ति या विभाग अदालत के आदेश का पालन नहीं करता, तो परिवादी अदालत में “इजराय” दायर कर आदेश लागू करवाने की मांग कर सकता है। इसके तहत अदालत संपत्ति कुर्क करने, बैंक खाते सीज करने, वेतन रोकने या नीलामी जैसे सख्त कदम उठा सकती है।

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